कवितायें
गुलाबी चूड़ियाँ PDF Print E-mail
Written by नागार्जुन   

नागार्जुन नागार्जुन हिन्दी साहित्य के श्रेष्ठतम साहित्यकारों मे से एक हैं । 1911 मे बिहार में दरभंगा के तरोनी गाँव मे पैदा हुये नागर्जुन के बचपन का नाम वैद्यनाथ मिश्र है लेकिन हिन्दी जगत मे वे बाबा नागार्जुन या सिर्फ 'बाबा' नाम से लोकप्रिय हुये । इन्होनें हिन्दी, मैथिली , बांग्ला और संस्कृत - इन चारो भाषाओं मे रचनायें की ।

नागार्जुन ने
छः से अधिक उपन्यास, एक दर्जन कविता संग्रह, दो खण्ड काव्य, दो मैथिली कविता संग्रह और एक मैथिली उपन्यास लिखा ।
1965 में उनकी मैथिली रचना , ' पत्रहीन नग्न गाछ ' के लिये उन्हें हिन्दी साहित्य के सबसे बड़े सम्मान , 'साहित्य अकादमी' पुरस्कार से सम्मानित किया गया ।

हिन्दी साहित्य की इस धरोहर की एक चुनिन्दा रचना आपके सम्मुख है । आशा है आपको पसन्द आयेगी ।


गुलाबी चूड़ियाँ


प्राइवेट बस का ड्राइवर है तो क्या हुआ,
सात साल की बच्ची का पिता तो है!
सामने गियर से उपर
हुक से लटका रक्खी हैं

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ग़ज़ल - एक संक्षिप्त परिचय PDF Print E-mail
Written by सुदीप कुमार   

अमीर ख़ुसरो - हिन्दी ग़ज़ल के प्रणेता
" चुपके-चुपके रात-दिन आँसू बहाना याद है ।
हमको अब तक आशिकी का वो ज़माना याद है | "

गजलों के बारे मे चाहे हमें कितना भी (कम) पता हो लेकिन हसरत मोहानी की ये ग़ज़ल आपने ज़रूर सुनी होगी । गुलाम अली ने अपनी मधुर आवाज मे इस ग़ज़ल और इसके रचयिता दोनो को अमर बना दिया है। ग़ज़लों को लोकप्रिय बनाने मे गुलाम अली , जगजीत सिंह और भुपिन्दर सरीखे ग़जल गायकों के योगदान पर फिर कभी चर्चा करेंगे ।
इस लेख में चर्चा का विषय ग़ज़ल और विशेष रुप से हिन्दी ग़जल है ।


ऐतिहासिक परिपेक्ष्य


कई विद्वानों का मानना है कि गजल लिखने की शुरुआत सबसे पहले 10 वीं सदी में फारस (Persia) मे हुई। सबसे पहले फारसी के कवि रुदकी ने ( 813 ई) मे ग़ज़ल लिखी जो कि पुरानी अरबी काव्य शैली 'क़सीदा' से प्रभावित थी | इस शैली मे कवि/शायर प्रेम और सौन्दर्य के विभिन्न पहलुओं का वर्णन करता है ।

12वीं सदी में तुर्क, अफगान और अरब हमलावरों के साथ इस काव्य विधा ने भी भारत मे कदम रखा । इन 800 सालों में ग़ज़ल की भाषा , शैली , विषय और स्वरूप सबमें काफी परिवर्तन आया है ।

साहित्यकारों के अनुसार भारत में हिन्दुस्तानी मे ग़ज़ल लिखने वाले पहले कवि 13 वीं सदी के अमीर ख़ुसरो (1253-1325 ) हैं । यहाँ यह बताना जरूरी होगा कि ख़ुसरो खड़ीबोली (आज की हिन्दी) के पहले कवि हैं। उनकी पहेलियाँ और मुकरियाँ हम से बहुत सारे लोगों ने अपने स्कूल के जमाने मे पढ़ी है । सूफी विचारधारा के इस महान कवि ने ग़ज़ल की विधा ( style) में कुछ ऐसे लिखा -

जो यार देखा नैन भर, दिल की गई चिंता उतर।
ऐसा नहीं कोई अजब, राखे उसे समझाय कर।

जब आँख से ओझल भया, तड़पन लगा मेरा जिया।
हक्का इलाही क्या किया आँसू चले भर लाय कर।

मेरो जो मन तुमने लिया, तुम उठा गम को दिया।
तुमने मुझे ऐसा किया जैसा पतंगा आग पर।

खुसरो कहे बातें गजब दिल में न लावे कुछ अजब।
कुदरत खुदा की है अजब, जब जिव दिया गुल लाय कर।

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तीन कवितायें PDF Print E-mail
Written by मोद 'निधि'   

1. चाहत


कहते कहते होंठ मे छाले निकल गए ,
हाय ! पर मुझको सुनने वाले निकल गए |

सोचता था अब कि एक छत मेरे सर पे हो ,
ये क्या खुदा कि मुहँ के निवाले निकल गए |

कोशिशें कि जीत लूँ दुश्मनों के भी दिल
देखता हूँ कि चाहने वाले निकल गए |

सोंचता हूँ मैं अब चुप ही रहूँ 'अति' ,
क्या करूँ पर - जुबां के ताले निकल गए |

कह तो लूँगा मैं खामोशियों की शायरी ,
दर्द-ए- दिल मगर, समझने वाले निकल गए |

ये कैसा वक्त आ गया है देखिए ,
खुदा के बन्दों के दिवाले निकल गए |

चलो , चलें यहाँ से ऐ मेरे हमसफ़र !
यहाँ से सारे जाने वाले निकल गए |

कब्र जब हमने अपनी खुद ही खोद ली ,
आस्तीन के सांप जो पाले निकल गए |

आज कौन जिसको हम अपना कह सकें ,
अपने सभी गैरों के हवाले निकल गए |

ख्वाइश थी आस्मां की मगर मुझको जब मिला ,
उसमें चमकने वाले सभी सितारे निकल गए |

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