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राग - दरबारी (पुस्तक अंश ) |
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Written by श्रीलाल शुक्ल
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आपेक्षिक घनत्व माने रिलेटिव डेंसिटी साइंस का क्लास लगा था। नवाँ दर्जा। मास्टर मोतीराम, जो एक तरह बी.एस-सी . पास थे, लड़कों को आपेक्षिक घनत्व पढ़ा रहे थे। बाहर उस छोटे-से गाँव में छोटेपन की, बतौर अनुप्रास , छटा छायी थी। सड़क पर ईख से भरी बैलगाड़ियाँ शकर मिल की ओर जा रही थीं। कुछ मरियल लड़के पीछे से ईख खींच-खींचकर भाग रहे थे। आगे बैठा हुआ गाड़ीवान खींच-खींचकर गालियाँ दे रहा था। गालियों का मौलिक महत्व आवाज़ की ऊँचाई में है, इसीलिए गालियाँ और जवाबी गालियाँ एक- दूसरे को ऊँचाई पर काट रही थीं। लड़के नाटक का मज़ा ले रहे थे, साइंस पढ़ रहे थे। गालियों का मौलिक महत्व आवाज़ की ऊँचाई में है एक लड़के ने कहा , "मास्टर साहब, आपेक्षिक घनत्व किसे कहते हैं ?" वे बोले, "आपेक्षिक घनत्व माने रिलेटिव डेंसिटी।" एक दूसरे लड़के ने कहा, "अब आप, देखिए , साइंस नहीं अंग्रेजी पढ़ा रहे हैं।" |
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इंस्पेक्टर मातादीन चाँद पर |
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Written by हरिशंकर परसाईं
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वैज्ञानिक कहते हैं , चाँद पर जीवन नहीं है। पर सीनियर पुलिस इंस्पेक्टर मातादीन ( डिपार्टमेण्ट मे एम.डी. सा'ब ) कहते हैं, वैज्ञानिक झूठ बोलते हैं। वहाँ हमारे जैसे मनुष्यों की आबादी है। " विज्ञान ने हमेशा इंस्पेक्टर मातादीन से मात खाई है। फिंगर प्रिंट विशेषज्ञ कहता रहता है -छुरे पर पाये गये निशान मुलज़िम के अँगुलियों के नहीं हैं। पर मातादीन उसे सजा दिला ही देते हैं । मातादीन कहते हैं , "ये वैज्ञानिक केस का पूरा इनवेस्टिगेशन नहीं करते। उन्होने चाँद का उजला हिस्सा देखा और कह दिया, वहाँ जीवन नहीं है।मैं चाँद का अँधेरा हिस्सा देखकर आया हूँ। वहाँ मनुष्यजाति है। यह बात सही है क्योंकि अँधेरे -पक्ष के मातादीन माहिर माने जाते है | पुछा जायेगा इंस्पेक्टर मातादीन चाँद पर क्यों गये थे ? टूरिस्ट की हैसियत से या किसी फरार अपराधी को पकड्ने ? नहीं , वे भारत की तरफ से सांस्क़ृतिक आदान- प्रदान के अंतर्गत गये थे। चाँद सरकार ने भारत सरकार को लिखा था - 'यों तो हमारी सभ्यता बहुत आगे बढी है । पर हमारी पुलिस मे पर्याप्त सक्षमता नहीं है। वह अपराधी का पता लगाने और उसे सजा दिलाने मे अक्सर सफल नहीं होती है। सुना है आपके यहाँ रामराज है । मेहरबानी करके किसी पुलिस अफसर को भेजें जो हमारी पुलिस को शिक्षित कर दे। ' |
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Written by हरिशंकर परसाई
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बारात में जाना कई कारण से टालता हूँ । मंगल कार्यों में हम जैसी चढ़ी उम्र के कुँवारों का जाना अपशकुन है। महेश बाबू का कहना है, हमें मंगल कार्यों से विधवाओं की तरह ही दूर रहना चाहिये। किसी का अमंगल अपने कारण क्यों हो ! उन्हें पछतावा है कि तीन साल पहले जिनकी शादी में वह गये थे, उनकी तलाक की स्थिति पैदा हो गयी है। उनका यह शोध है कि महाभारत का युद्ध न होता, अगर भीष्म की शादी हो गयी होती। और अगर कृष्णमेनन की शादी हो गयी होती, तो चीन हमला न करता। .......... अपने पुत्र की सफल बारात से प्रसन्न मायराम के मन में उस दिन नागपुर में बड़ा मौलिक विचार जागा था। कहने लगे, " बस, अब तुमलोगों की बारात में जाने की इच्छा है। " हम लोगों ने कहा - ' अब किशोरों जैसी बारात तो होगी नही। अब तो ऐसी बारात ऐसी होगी- किसी को भगा कर लाने के कारण हथकड़ी पहने हम होंगे और पीछे चलोगे तुम जमानत देने वाले। ऐसी बारात होगी। चाहो तो बैण्ड भी बजवा सकते हो।" ......... विवाह का दृश्य बड़ा दारुण होता है। विदा के वक्त औरतों के साथ मिलकर रोने को जी करता है। लड़की के बिछुड़ने के कारण नहीं, उसके बाप की हालत देखकर लगता है, इस देश की आधी ताकत लड़कियों की शादी करने मे जा रही है। पाव ताकत छिपाने मे जा रही है - शराब पीकर छिपाने में, प्रेम करके छिपाने में, घूस लेकर छिपाने में ... बची पाव ताकत से देश का निर्माण हो रहा है, - तो जितना हो रहा है, बहुत हो रहा है। आखिर एक चौथाई ताकत से कितना होगा। ......... बारात यात्रा से मैं बहुत घबराता हूँ , खासकर लौटते वक्त जब बाराती बेकार बोझ हो जाता है । अगर जी भर दहेज न मिले, तो वर का बाप बरातियों को दुश्मन समझता है। मैं सावधानी बरतता हूँ कि बारात की विदा के पहले ही कुछ बहाना करके किराया लेकर लौट पड़ता हूँ।
एक बारात की वापसी मुझे याद है।
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